शिक्षक संगठनों ने अनिवार्य टीईटी के खिलाफ संयुक्त संघर्ष का बिगुल फूंका

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शिक्षक संगठनों ने अनिवार्य टीईटी के खिलाफ संयुक्त संघर्ष का बिगुल फूंका

शिक्षकों के एक बड़े वर्ग ने अनिवार्य शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को लेकर सरकार के फैसले के खिलाफ एकजुटता दिखाते हुए एक बड़ा संघर्ष शुरू करने का ऐलान किया है। विभिन्न शिक्षक संगठनों ने एक संयुक्त बैठक के बाद यह घोषणा की, जिसमें कहा गया कि टीईटी को अनिवार्य बनाने का कदम शिक्षकों के सम्मान और उनके अधिकारों का हनन है। शिक्षकों का मानना है कि जो शिक्षक पहले से ही वर्षों से अध्यापन कार्य कर रहे हैं और जिनके पास पर्याप्त अनुभव है, उनके लिए दोबारा यह परीक्षा थोपना अन्यायपूर्ण है।

शिक्षक नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि टीईटी की अनिवार्यता अनुभवी शिक्षकों के मनोबल को गिराएगी और उनके पेशेवर जीवन में अनावश्यक बाधाएं पैदा करेगी। उन्होंने कहा कि यह फैसला उन शिक्षकों के लिए भी चिंता का विषय है जो अपनी सेवा के अंतिम पड़ाव पर हैं। शिक्षकों की मांग है कि टीईटी को केवल नए अभ्यर्थियों के लिए लागू किया जाना चाहिए, न कि उन लोगों के लिए जो पहले से ही स्थायी पदों पर कार्यरत हैं।

इस संयुक्त संघर्ष के तहत, शिक्षक संगठन सरकार पर दबाव बनाने के लिए कई तरह के कदम उठाएंगे। इनमें जिला मुख्यालयों पर विरोध प्रदर्शन, मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को ज्ञापन सौंपना, काले बिल्ले लगाकर विरोध दर्ज कराना और यदि आवश्यक हुआ तो अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने जैसे कड़े निर्णय भी शामिल हैं। विभिन्न शिक्षक संघों ने एकजुट होकर यह तय किया है कि वे तब तक अपनी लड़ाई जारी रखेंगे जब तक सरकार उनके पक्ष में कोई ठोस निर्णय नहीं लेती।

इस आंदोलन में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के शिक्षक शामिल हो रहे हैं, जो अपनी मांगों को लेकर मुखर हैं। उनका कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के नाम पर अनुभवी शिक्षकों को परेशान करना स्वीकार्य नहीं है। शिक्षकों ने सरकार से अपील की है कि वह इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करे और शिक्षकों के हित में एक सकारात्मक समाधान निकाले, ताकि शिक्षण समुदाय में व्याप्त असंतोष को दूर किया जा सके।

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