विभागाध्यक्ष की गरिमा पर सवाल: शिकायत और प्रतिक्रिया

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हाल ही में एक घटना ने संस्थान में खलबली मचा दी है, जहाँ एक शिकायत सीधे निदेशक प्रो. एस.एन. संखवार तक पहुँच गई, जिसने प्रोटोकॉल और विभागीय पदानुक्रम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले ने न केवल प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचाई, बल्कि विभागाध्यक्षों के बीच भी गहरी चिंता पैदा कर दी है, खासकर एक विभागाध्यक्ष ने तो इसे अपनी गरिमा पर सीधा हमला करार दिया है।

सूत्रों के अनुसार, यह शिकायत किसी विशिष्ट मुद्दे से संबंधित थी, लेकिन जिस तरीके से इसे उठाया गया, उसने सभी को चौंका दिया। विभागाध्यक्ष का कहना था कि यदि कोई समस्या या शिकायत थी, तो उसे पहले उनके संज्ञान में लाया जाना चाहिए था। सीधे निदेशक के पास जाने से विभागाध्यक्ष की भूमिका और उनके अधिकार क्षेत्र को दरकिनार किया गया, जिससे उन्हें बेहद अपमानित महसूस हुआ।

इस घटना पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, संबंधित विभागाध्यक्ष ने इसे “शर्मनाक” बताया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तरह की कार्यप्रणाली से विभागाध्यक्ष का पद और उसका महत्व पूरी तरह से समाप्त हो जाता है। “अगर छोटी-छोटी शिकायतें भी सीधे निदेशक तक पहुँचाई जाएंगी, तो विभागाध्यक्ष का कोई मतलब नहीं रह जाता,” उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा। उनका यह बयान केवल उनकी व्यक्तिगत नाराजगी नहीं थी, बल्कि संस्थान के भीतर स्थापित प्रशासनिक ढांचे के प्रति बढ़ती निराशा का भी प्रतीक था।

यह घटना दर्शाती है कि संस्थान के भीतर संवाद और शिकायत निवारण प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। विभागाध्यक्षों की भूमिका को मजबूत करना और यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि उनकी अथॉरिटी का सम्मान किया जाए, ताकि वे अपने विभागों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन कर सकें। इस पूरे प्रकरण ने एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है कि क्या प्रशासनिक प्रक्रियाएं इतनी लचीली होनी चाहिए कि वे विभागीय प्रमुखों को पूरी तरह से बायपास कर सकें, या फिर एक निश्चित पदानुक्रम का पालन करना अनिवार्य है ताकि व्यवस्था बनी रहे और किसी भी पद की गरिमा अक्षुण्ण रहे।

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