लीलाधर की पूजा और खाटू श्याम धाम की निशान यात्रा
लीलाधर, भगवान कृष्ण का ही एक रूप, उनकी पावन पूजा-अर्चना का दिन था। सुबह से ही भक्तों का ताँता लगना शुरू हो गया था। मंदिर प्रांगण भक्तिमय भजनों और कीर्तन से गूँज रहा था। हर चेहरे पर एक अलौकिक चमक और मन में अपार श्रद्धा का भाव स्पष्ट झलक रहा था। विधि-विधान से पूजा संपन्न हुई, जिसमें भगवान को पुष्प, नैवेद्य और चंदन अर्पित किए गए। पूरा वातावरण दिव्य सुगंध से भर गया।
पूजा के समापन पर, जब आरती का समय आया, तो एक अद्भुत दृश्य उपस्थित हुआ। जगमगाते दीपकों की लौ, घंटियों की मधुर ध्वनि और शंखनाद से पूरा मंदिर परिसर गुंजायमान हो उठा। भक्तों ने अपनी आँखें बंद कर लीं और पूरी तन्मयता से आरती में लीन हो गए, मानो वे सीधे भगवान से संवाद कर रहे हों। आरती की पवित्र अग्नि ने सभी के मन को शुद्ध कर दिया और एक नई ऊर्जा का संचार हुआ।
आरती के पश्चात, सभी भक्तों में एक नया उत्साह और उमंग देखी गई। आज एक विशेष कार्य संपन्न होना था – 125 निशान (झंडे) खाटू श्याम धाम ले जाने थे। ये निशान केवल कपड़े के टुकड़े नहीं थे, बल्कि हर निशान में भक्तों की अटूट श्रद्धा, उनकी प्रार्थनाएं और उनके संकल्प समाहित थे। एक पंक्ति में सजे, लहराते हुए ये निशान मानो खाटू नरेश को स्वयं पुकार रहे थे।
भक्तों का एक विशाल समूह, “जय श्री श्याम” के उद्घोष के साथ, उन 125 निशानों को लेकर खाटू श्याम धाम की ओर पैदल चल पड़ा। रास्ते भर श्याम बाबा के भजन गाए जा रहे थे, ढोल-नगाड़ों की थाप पर भक्त झूम रहे थे। यात्रा भले ही लंबी थी, लेकिन किसी के चेहरे पर थकान का नामोनिशान नहीं था। हर कदम श्याम बाबा के प्रति विश्वास और प्रेम का प्रतीक था। खाटू श्याम धाम पहुँचकर, उन सभी निशानों को श्रद्धापूर्वक बाबा श्याम के चरणों में अर्पित किया गया। यह क्षण हर भक्त के लिए अत्यंत भावुक और पवित्र था, जिसने उनकी आध्यात्मिक यात्रा को पूर्णता प्रदान की।
