रमजान का आखिरी अशरा: मस्जिदों में इबादत और एतिकाफ की रूहानी रौनक

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रमजानुल मुबारक का आखिरी अशरा शुरू होते ही, गांव-देहात से लेकर बड़े शहरों तक की मस्जिदों में एक रूहानी रौनक छा जाती है। मगरिब की अजान की गूंज के साथ ही, अल्लाह के नेक बंदे एतिकाफ की पाक नीयत से मस्जिदों में दाखिल होना शुरू हो गए हैं। यह वह दस दिन हैं, जो बेशुमार बरकतों और रहमतों से भरे हैं, जिनमें ‘शब-ए-कद्र’ छिपी हुई है, जो हजार महीनों से अफजल रात है।

एतिकाफ सिर्फ मस्जिद में ठहरना नहीं, बल्कि दुनियावी तमाम उलझनों से कटकर पूरी तरह अल्लाह की इबादत में खुद को मसरूफ कर लेना है। इन पाक दिनों में एतिकाफ करने वाले दिन-रात कुरान की तिलावत, नमाजें, जिक्र-अजकार और दुआओं में लगे रहते हैं। उनकी आंखें अल्लाह की रहमत की तलब में नम होती हैं और दिल तौबा व इस्तगफार से मुनव्वर। हर मस्जिद में इबादत का एक ऐसा माहौल बन जाता है, जहां हर सांस अल्लाह की याद में गुम होती दिखाई देती है।

शहरों की बड़ी मस्जिदों में जहां एतिकाफ करने वालों की तादाद ज्यादा होती है, वहीं छोटे कस्बों और गांवों की मस्जिदों में भी चंद खुशनसीब लोग इस इबादत को अदा करते हैं। यह एक ऐसा मौका है जब मुसलमान अपने रब से गहरा रिश्ता कायम करते हैं, अपनी रूह की सफाई करते हैं और गुनाहों से माफी मांगते हैं। इबादतगुजारों के चेहरों पर सुकून और इत्मीनान साफ झलक रहा है, जो बताता है कि उन्होंने खुद को पूरी तरह अल्लाह की रजा के सुपुर्द कर दिया है। यह आखिरी अशरा हमें अपनी जिंदगी के मकसद को याद दिलाता है और हमें एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है।

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