मेरी पैतृक भूमि का हस्तांतरण: एक जीवित व्यक्ति की पुकार

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महोदय, मैं जीवित हूँ… जी हाँ, मैं आज भी इस धरती पर साँस ले रहा हूँ। मेरा शरीर, मेरी आत्मा, मेरे सपने, सब कुछ यहीं, इसी मिट्टी से जुड़े हुए हैं। यह बात मुझे इसलिए कहनी पड़ रही है, क्योंकि जब बात मेरे पैतृक ज़मीन की आती है, तो ऐसा लगता है मानो मेरा अस्तित्व ही किसी कागज़ के पन्नों से गुम हो गया हो। मैंने अपनी पैतृक भूमि को मेरे नाम पर हस्तांतरित करवाने की अपील की है, और यह सिर्फ़ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, यह मेरी पहचान की लड़ाई है, मेरे वजूद की गवाही है।

यह ज़मीन मेरे पूर्वजों की देन है, जिसे उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा था। यहाँ मेरे दादाजी की यादें हैं, मेरे पिताजी की मेहनत की कहानियाँ हैं। इस ज़मीन का हर कण मुझसे जुड़ा है, मेरी जड़ों से जुड़ा है। बचपन से मैंने इसी मिट्टी में खेलकर बड़ा हुआ हूँ, इसी के अन्न पर पला-बढ़ा हूँ। आज जब मुझे अपने ही हक के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है, तो मेरा दिल दर्द से भर उठता है।

दफ़्तरों के चक्कर लगाते-लगाते, अपनी बात समझाते-समझाते, कई बार ऐसा महसूस हुआ है कि शायद मेरी आवाज़ किसी तक पहुँच ही नहीं रही है। क्या एक जीवित व्यक्ति की पुकार इतनी कमज़ोर हो सकती है कि उसे सुना ही न जाए? मैं बस इतना चाहता हूँ कि मुझे मेरा न्याय मिले, मेरा हक़ मिले। मैं जीवित हूँ, और एक जीवित व्यक्ति को अपने पूर्वजों की विरासत से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। मेरी यह अपील केवल कागज़ पर एक आवेदन नहीं, बल्कि एक बेटे की पुकार है जो अपनी जड़ों को बचाना चाहता है। मुझे आशा है कि मेरी बात सुनी जाएगी और मेरी पैतृक भूमि मेरे नाम पर स्थानांतरित की जाएगी, जिससे मैं अपने अस्तित्व को एक बार फिर से साबित कर सकूँ।

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