नवरंग में होली का उल्लास, फाग गीतों की बौछार से तन-मन सराबोर
वसंत ऋतु का आगमन होते ही प्रकृति एक नई उमंग से भर उठती है, और इसी उमंग का प्रतीक है रंगों का त्योहार होली। जब फागुन का महीना अपनी मस्ती और मादकता लिए आता है, तो हर दिल में होली का नवरंग अपने आप खिल उठता है। यह सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि खुशियों, मेल-मिलाप और भाईचारे का अनूठा संगम है।
होली की सुबह का नजारा ही कुछ और होता है। हवा में गुलाल की महक घुल जाती है, और हर तरफ हंसी-ठिठोली की आवाजें गूंजने लगती हैं। बच्चे, बूढ़े, जवान, सभी एक रंग में रंग जाते हैं। पिचकारियों से निकलते रंगों की बौछार, और एक-दूसरे पर गुलाल मलने का आनंद, यह सब मिलकर एक अद्भुत माहौल रचते हैं। लाल, पीला, हरा, नीला – ये सारे रंग न सिर्फ तन को रंगते हैं, बल्कि मन की सारी उदासियों को धोकर एक नई ताजगी भर देते हैं।
इस पर्व का एक और अभिन्न अंग हैं फाग गीत। ढोल की थाप और मंजीरों की झंकार पर गाए जाने वाले ये लोकगीत होली के जोश को कई गुना बढ़ा देते हैं। “आज बिरज में होली रे रसिया,” “रंग बरसे भीगे चुनर वाली” जैसे गीत सुनते ही पैर अपने आप थिरकने लगते हैं। इन गीतों की बौछार से ऐसा लगता है मानो पूरा वातावरण ही प्रेम और आनंद के रंग में भीग गया हो। तन और मन दोनों ही इस मधुर संगीत और रंगों की मस्ती में सराबोर हो जाते हैं, सारी चिंताएं भूलकर बस वर्तमान के उल्लास में खो जाते हैं।
होली का यह त्योहार हमें यह सिखाता है कि जीवन के हर रंग को खुलकर जीना चाहिए। यह हमें एक-दूसरे के करीब लाता है, गिले-शिकवे भुलाकर नए सिरे से रिश्तों को मजबूत करने का अवसर देता है। नवरंग में रंगी यह होली, और फाग गीतों की बौछार से भीगा यह तन-मन, हर साल एक अमिट छाप छोड़ जाता है।
