झूम उठे भक्त: निमिया के डार मैया झूले ली झुलनवा
मंदिर प्रांगण में एक अद्भुत संध्या का आयोजन था। चारों ओर भक्ति का ऐसा वातावरण था कि हर मन आध्यात्मिकता में लीन हो रहा था। ‘निमिया के डार मैया झूले ली झुलनवा…’ जैसे ही यह मनमोहक देवी गीत स्पीकर पर गूंजा, एक अलौकिक ऊर्जा पूरे परिसर में फैल गई। माँ दुर्गा की महिमा का बखान करते इस गीत की हर पंक्ति में इतनी श्रद्धा और मिठास थी कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए।
गीत की धुन जैसे-जैसे तेज होती गई और गायक की आवाज में भावों की गहराई बढ़ती गई, भक्तों के कदम अपने आप थिरकने लगे। पहले कुछ लोग धीरे-धीरे झूम रहे थे, फिर धीरे-धीरे पूरा जनसमूह तालियों की गड़गड़ाहट और भक्तिमय नारों के साथ नृत्य करने लगा। न कोई संकोच था, न कोई रोक-टोक; बस माँ के प्रति अगाध प्रेम और भक्ति का सैलाब उमड़ रहा था। हर चेहरा आनंद से उज्ज्वल था, हर हाथ ऊपर उठकर माँ की जय-जयकार कर रहा था।
बच्चे, बूढ़े, जवान—सभी एक साथ नाच रहे थे, जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उन्हें एक धागे में पिरो दिया हो। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं मैया नीम के वृक्ष की डाल पर झूलते हुए अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही हों। यह सिर्फ एक गीत नहीं था, यह एक अनुभव था, जिसने हर उपस्थित व्यक्ति के हृदय को छू लिया। देर रात तक यह भक्तिमय माहौल बना रहा और भक्तों ने माँ के चरणों में अपनी श्रद्धा और प्रेम नृत्य के माध्यम से अर्पित किया। यह संध्या हर किसी की स्मृति में एक अविस्मरणीय पल बनकर दर्ज हो गई।
