घोड़े-ऊंट वालों पर लगाम नहीं: दो जिलों की पुलिस सीमा विवाद में उलझी रही
सीमावर्ती इलाकों में अक्सर कुछ असामाजिक तत्वों को अपनी गतिविधियों को अंजाम देने का एक आसान रास्ता मिल जाता है, खासकर जब प्रशासनिक इकाइयों के बीच सीमाएँ स्पष्ट न हों या सहयोग की कमी हो। ऐसा ही एक वाकया हाल ही में दो पड़ोसी जिलों की सीमा पर देखने को मिला, जहाँ घोड़े और ऊंट पालने वाले कुछ लोग पुलिस के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। इन पर नकेल कसने में स्थानीय प्रशासन को भारी मशक्कत करनी पड़ रही है, और कभी-कभी तो स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि पुलिस भी बेबस नजर आती है।
हाल ही में, एक ऐसे ही मामले में, अवैध गतिविधियों में लिप्त कुछ घोड़े और ऊंट मालिकों के बारे में सूचना मिली। बताया गया कि ये लोग अक्सर सीमा का फायदा उठाकर प्रतिबंधित सामानों की आवाजाही करते हैं या अवैध खनन जैसी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। सूचना मिलते ही दोनों जिलों की पुलिस टीमें मौके पर पहुंचीं। लेकिन जो होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। अपराधियों को पकड़ने के बजाय, दोनों जिलों की पुलिस आपस में ही सीमा विवाद में उलझ गईं।
तकरीबन दो घंटे तक यह बहस चलती रही कि घटनास्थल किस जिले के अधिकार क्षेत्र में आता है। एक टीम का कहना था कि यह इलाका उनके जिले में है, तो दूसरी टीम अपने दावे पर अड़ी थी। इस दौरान, वे अपराधी जिनकी तलाश में पुलिस आई थी, स्थिति का फायदा उठाकर आसानी से फरार हो गए। जनता जो पुलिस से त्वरित कार्रवाई की उम्मीद कर रही थी, वह इस दृश्य को देखकर हताश और निराश हो गई।
यह घटना न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में समन्वय की कितनी कमी है। जब तक दोनों जिलों के प्रशासन और पुलिस विभाग मिलकर काम करने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं बनाएंगे, तब तक ऐसे तत्व कानून की आँखों में धूल झोंकते रहेंगे। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन घोड़े और ऊंट वालों पर कोई लगाम नहीं है, और वे बेखौफ होकर अपने गलत धंधों को अंजाम देते हैं। इस घटना ने एक बार फिर इस जरूरत को रेखांकित किया है कि अंतर-जिला सहयोग को मजबूत किया जाए ताकि अपराधियों को किसी भी बहाने से भागने का मौका न मिले। यह आवश्यक है कि जिम्मेदार अधिकारी इस समस्या का स्थायी समाधान खोजें और सुनिश्चित करें कि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों।
