किसानों का बढ़ता असंतोष: औद्योगिक कॉरिडोर और विस्थापन का दर्द
मधुपुर क्षेत्र के लोहरा, तकिया और बट जैसे ग्रामीण इलाकों में आजकल एक अजीब सी बेचैनी फैली हुई है। दरअसल, जब से इन गांवों की उपजाऊ जमीनों का औद्योगिक कॉरिडोर के लिए सर्वे शुरू हुआ है, किसानों का असंतोष थमने का नाम नहीं ले रहा। यह केवल कागजी कार्रवाई नहीं है, बल्कि किसानों के दिलों में गहरी जड़ें जमा चुकी चिंता है, क्योंकि उनकी पुश्तैनी जमीनें, जिनसे उनका जीवनयापन चलता है, अब छिनने की कगार पर हैं।
सोमवार को इस असंतोष की आग एक बार फिर तब भड़क उठी, जब घोरावल के विधायक अनिल मौर्य क्षेत्र के दौरे पर पहुंचे। किसानों को लगा कि शायद उनकी बात सुनी जाएगी, लेकिन जैसे ही विधायक महोदय उनके सामने आए, निराशा और गुस्से का बांध टूट गया। सैकड़ों की संख्या में इकट्ठे किसानों ने विधायक को घेर लिया और अपनी पीड़ा व्यक्त करनी शुरू कर दी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह जमीन केवल उनकी संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी पहचान है, उनका भविष्य है।
किसानों का कहना है कि उन्हें इस तथाकथित ‘विकास’ की कोई कीमत नहीं चाहिए, जो उनकी जड़ों को ही काट दे। वे अपनी ज़मीन और आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें डर है कि एक बार जमीन छिन जाने के बाद, उन्हें उचित मुआवजा भी नहीं मिलेगा और वे हमेशा के लिए विस्थापित हो जाएंगे। सरकार और प्रशासन की तरफ से मिल रहे आश्वासन उन्हें झूठे प्रतीत हो रहे हैं। उनका आरोप है कि सर्वे के दौरान भी उनकी भावनाओं का कोई ख्याल नहीं रखा गया और मनमाने ढंग से कार्यवाही की गई।
विधायक को किसानों के आक्रोश का सीधा सामना करना पड़ा। उन्हें किसानों के तीखे सवालों और गुस्से भरी आवाजों के बीच अपनी बात रखने का शायद ही मौका मिला हो। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि विकास परियोजनाओं को लागू करते समय स्थानीय लोगों, खासकर किसानों की चिंताओं को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है। जब तक किसानों के हितों का सम्मान नहीं किया जाता, इस तरह का असंतोष शांत होना मुश्किल है। लोहरा, तकिया और बट गांवों के किसानों की यह कहानी अकेले उनकी नहीं, बल्कि ऐसे कई लोगों की है जो विकास की वेदी पर अपनी आहुति देने को मजबूर हैं। उनकी मांगें स्पष्ट हैं – न्याय और सम्मानजनक जीवन का अधिकार।
