रील और व्हाट्सएप का ‘तुरंता साहित्य’: हिंदी के लिए चुनौती और चिंतन

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काशी की साहित्यिक विरासत से जुड़े विद्वानों और बीएचयू के हिंदी विभाग के प्रोफेसरों ने एक गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि ‘रील’ और ‘व्हाट्सएप’ जैसे माध्यमों से नई पीढ़ी तक पहुँच रहा ‘तुरंता साहित्य’ हिंदी भाषा के भविष्य के लिए गंभीर खतरा है।

यह ‘तुरंता साहित्य’ क्या है? यह वह सामग्री है जो अत्यधिक संक्षिप्त, सतही और तात्कालिक मनोरंजन के लिए रची जाती है। इसमें अक्सर गहराई का अभाव होता है और भाषा की शुद्धता व व्याकरण को नज़रअंदाज़ किया जाता है। जहाँ तकनीकी प्रगति ने साहित्य को सुलभ बनाया है, वहीं इसने एक ऐसी प्रवृत्ति को भी जन्म दिया है जो साहित्य के मूल स्वरूप के लिए हानिकारक है।

इस प्रवृत्ति को खतरनाक मानने के कई ठोस कारण हैं। पहला, यह भाषा की समृद्धता को कमज़ोर करता है। जब युवा ऐसी सामग्री पढ़ते हैं जिसमें शब्द-संपदा सीमित होती है और अभिव्यंजना की सूक्ष्मता नहीं होती, तो उनकी अपनी भाषा क्षमता प्रभावित होती है। वे गहन चिंतन और जटिल भावनाओं को व्यक्त करने की कला से दूर हो जाते हैं।

दूसरा, यह पढ़ने की आदतों को बिगाड़ता है। निरंतर छोटी, चटकदार सामग्री पढ़ने से ध्यान केंद्रित करने की अवधि घटती जाती है। गंभीर अध्ययन, लंबी कहानियों में डूबने या किसी विचार पर देर तक मनन करने की प्रवृत्ति कम हो जाती है। साहित्य केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि अनुभव, भावना और विचार की गहरी यात्रा है, जिसे ‘तुरंता साहित्य’ की गति और सतहीपन बाधित करती है।

तीसरा, यह नई पीढ़ी को हिंदी की महान साहित्यिक परंपरा से विमुख कर रहा है। जब तात्कालिक सामग्री ही साहित्य का पर्याय बन जाती है, तो हमारी कालजयी कृतियाँ और महत्वपूर्ण रचनाएँ अनदेखी रह जाती हैं। साहित्यकारों की यह चिंता व्यर्थ नहीं है; यह एक चेतावनी है कि हमें अपनी भाषा और उसकी विरासत की रक्षा के लिए सचेत रहना होगा, ताकि हिंदी केवल ‘तुरंत’ की नहीं, बल्कि ‘अमर’ साहित्य की भाषा बनी रहे।

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