सोमवार की रात: परिवार की शांति और मेरा सुकून
सोमवार की रात थी, और दिनभर की भागदौड़ के बाद, घर में एक अजीब-सा सुकून और शांति छा गई थी। बाहर भले ही शहर की हलचल जारी हो, लेकिन हमारे छोटे से आशियाने में, घड़ी की सुइयां जैसे ही दस के अंक को छू रही थीं, एक गहरी खामोशी पसरने लगी थी। पूरे परिवार ने अभी-अभी रात का भोजन समाप्त किया था। अम्मा के हाथ का बना सादा, पर स्वादिष्ट खाना, और खाने की मेज पर हुई हल्की-फुल्की बातें, दिनभर की सारी थकान को धो चुकी थीं।
खाना खत्म होते ही, सभी ने सोने की तैयारी शुरू कर दी। घर की बत्तियां एक-एक करके बुझती चली गईं, और हल्की डिम लाइट में हम सब अपने-अपने बिस्तरों की ओर बढ़ चले। मैं भी उसी कमरे में था जहाँ मेरी अम्मा, मेरा भाई और मेरी बहन सोने के लिए लेटे हुए थे। मेरा बिस्तर उनसे बस थोड़ी ही दूरी पर था, इतनी कि मैं उनकी हल्की, गहरी होती सांसों को साफ सुन सकता था। यह एक ऐसा क्षण था जब मुझे अपने परिवार के इतने करीब होने का एहसास सबसे ज्यादा होता था – एक अदृश्य डोर, जो हमें एक-दूसरे से बांधे रखती थी।
सोने से पहले, अम्मा ने शायद अनजाने में ही, कोई पुरानी लोरी गुनगुनानी शुरू की, जिसने मेरे बचपन की सुखद यादों को ताजा कर दिया। भाई और बहन तो शायद पहले ही नींद की गहरी वादियों में खो चुके थे, उनके मासूम चेहरों पर दिनभर के खेल और पढ़ाई की हल्की थकान साफ झलक रही थी। मैं अपनी आंखें मूंदकर लेटा रहा, और उस कमरे की शांत, सुरक्षित और प्यार से भरी महक को महसूस करता रहा। बाहर की रात भले कितनी भी खामोश क्यों न हो, मेरे अंदर मेरे परिवार की गर्माहट थी। धीरे-धीरे, मैं भी नींद के आगोश में समा गया, अगले दिन की नई सुबह का इंतजार करते हुए। यह हर रात का एक सुंदर अंत था, जब पूरा परिवार एक छत के नीचे, सुरक्षित और संतुष्ट होकर सोता था।
