एक डॉक्टर, एक लाख जानवर: पशु चिकित्सा व्यवस्था की भयावह तस्वीर
एक लाख जानवरों पर एक डॉक्टर की जिम्मेदारी—यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि पशु चिकित्सा प्रणाली की एक भयावह तस्वीर है। कल्पना कीजिए उस अकेले डॉक्टर की, जिसके कंधे पर हजारों-लाखों बेजुबानों के जीवन का बोझ है। यह किसी भी मानवीय क्षमता से परे है, एक ऐसी स्थिति जो हर दिन अनगिनत जानवरों के लिए पीड़ा का कारण बनती है।
सुबह से शाम तक, यह डॉक्टर एक अथक युद्ध लड़ता है। बीमार और घायल जानवरों की लंबी कतारें, हर आँख में उम्मीद और दर्द का मिलाजुला भाव। एक समय में कितने जानवरों का इलाज किया जा सकता है? कितने को सही निदान और पर्याप्त देखभाल मिल पाती होगी? शायद बहुत कम। इस विशाल अनुपात में, गुणवत्तापूर्ण उपचार देना लगभग असंभव हो जाता है। कई बार तो डॉक्टर को प्राथमिक उपचार और गंभीर मामलों में से किसी एक को चुनना पड़ता है, जिससे कई बेजुबान केवल इंतजार करते रह जाते हैं।
गाँवों और दूरदराज के इलाकों में स्थिति और भी दयनीय है, जहाँ पशुधन किसानों की आजीविका का आधार है। जब उनके जानवर बीमार पड़ते हैं और समय पर डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता, तो वे बेबस रह जाते हैं। कई बार तो इलाज के अभाव में जानवर दम तोड़ देते हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, और उनकी रोजी-रोटी पर संकट आ जाता है। यह केवल जानवरों की बात नहीं, यह हमारी मानवीय संवेदनशीलता और हमारे समाज के विकास की भी बात है। एक स्वस्थ पशुधन हमारी अर्थव्यवस्था और पोषण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन इस तरह की अव्यवस्था से पशुओं में बीमारियाँ फैलने का खतरा बढ़ जाता है, जो अंततः मनुष्यों को भी प्रभावित कर सकता है।
डॉक्टरों पर काम का अत्यधिक बोझ उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से थका देता है। वे चाहकर भी हर जानवर को पर्याप्त समय और ध्यान नहीं दे पाते। यह एक ऐसी दुर्दशा है जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें और अधिक पशु चिकित्सकों की आवश्यकता है, बेहतर बुनियादी ढाँचे और संसाधनों की आवश्यकता है ताकि हमारे बेजुबान साथी भी एक स्वस्थ और दर्द-मुक्त जीवन जी सकें। यह अव्यवस्था नहीं, बल्कि एक गंभीर संकट है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
