रंगभरी एकादशी पर अभेद्य सुरक्षा: त्रिस्तरीय घेरा और ड्रोन निगरानी

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रंगभरी एकादशी का त्योहार, जिसे काशी विश्वनाथ नगरी में एक विशेष उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है, इस वर्ष भी अपने पूरे वैभव के साथ आने वाला है। भगवान शिव और माता पार्वती के गौना उत्सव के रूप में मनाई जाने वाली यह एकादशी, शिव भक्तों के लिए होली के आगमन का संकेत भी देती है। इस पावन अवसर पर, बाबा विश्वनाथ मंदिर और उसके आसपास लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, जिसके मद्देनजर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं।

इस साल, रंगभरी एकादशी पर एक त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा तैयार किया जाएगा, ताकि भक्तों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और किसी भी अप्रिय घटना को टाला जा सके। सुरक्षा व्यवस्था का पहला स्तर मंदिर के भीतर और गर्भगृह के आसपास केंद्रित होगा, जिसमें स्थानीय पुलिस बल और मंदिर के स्वयंसेवक भीड़ को नियंत्रित करेंगे। दूसरा स्तर मंदिर परिसर के बाहरी हिस्सों और प्रमुख मार्गों पर सक्रिय रहेगा, जहां प्रांतीय सशस्त्र बल (पीएसी) के जवान और अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किए जाएंगे। तीसरा और सबसे ऊपरी स्तर वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में होगा, जो पूरे क्षेत्र की गतिविधियों पर पैनी नजर रखेंगे और किसी भी आपात स्थिति में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।

सुरक्षा के इस व्यापक बंदोबस्त में आधुनिक तकनीक का भी भरपूर उपयोग किया जाएगा। भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ड्रोन कैमरों से लगातार निगरानी की जाएगी। ये ड्रोन न केवल मंदिर परिसर बल्कि आसपास के घाटों, गलियों और छतों तक पर नजर रखेंगे। ड्रोन फुटेज की मदद से भीड़ की गतिविधियों, संदिग्ध व्यक्तियों या वस्तुओं की पहचान तुरंत की जा सकेगी और नियंत्रण कक्ष को इसकी जानकारी दी जाएगी। इसके अतिरिक्त, पूरे क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरों का जाल बिछाया गया है, और सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी भी भीड़ के बीच रहकर असामाजिक तत्वों पर नजर रखेंगे। यातायात प्रबंधन के लिए भी विशेष योजनाएं बनाई गई हैं, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

प्रशासन का उद्देश्य यह है कि भक्तजन पूरी श्रद्धा और सुरक्षित माहौल में रंगभरी एकादशी का पर्व मना सकें। सभी श्रद्धालुओं से अपील की गई है कि वे सुरक्षाकर्मियों का सहयोग करें और शांतिपूर्ण ढंग से इस उत्सव का आनंद लें। यह सुरक्षा व्यवस्था भक्तों की सुविधा और सुरक्षा के लिए ही की जा रही है, ताकि काशी की यह अनूठी परंपरा निर्बाध रूप से जारी रह सके।

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