बालू मस्ती की दरबारी कान्हड़ा में सधी हुई प्रस्तुति

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भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनकी उंगलियों में जादू और जिनकी आत्मा में संगीत बसता है। बालू मस्ती ऐसे ही एक अद्वितीय कलाकार हैं, जिनके वादन का हर स्वर श्रोताओं को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है। हाल ही में उनकी दरबारी कान्हड़ा की प्रस्तुति ने हर किसी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

दरबारी कान्हड़ा, रागों का महाराजा, अपनी गंभीरता, उदात्तता और गहरी रात के माहौल के लिए जाना जाता है। यह राग अपने आप में एक पूरी गाथा समेटे हुए है, जिसमें विरह, चिंतन और आत्मा की पुकार छिपी होती है। बालू मस्ती ने इस राग की आत्मा को इतनी बारीकी से समझा और प्रस्तुत किया कि हर आलाप, हर तान, हर सर्गम अपने आप में एक कहानी कह रही थी। मंच पर जैसे ही उन्होंने अपने वाद्य यंत्र को थामा, वातावरण में एक गहरी शांति छा गई।

उन्होंने जब विलंबित लय में दरबारी कान्हड़ा का विस्तार शुरू किया, तो ऐसा लगा मानो मंदिर के गर्भगृह से कोई पवित्र ध्वनि निकल रही हो। मींड और गमकों का उनका प्रयोग इतना शुद्ध और प्रभावी था कि राग का हर सूक्ष्म भाव जीवंत हो उठा। उनकी उंगलियों की हर हरकत राग की गहनता को और बढ़ा रही थी। मध्य और द्रुत लय में आते-आते उन्होंने राग के विभिन्न पहलुओं को जिस सहजता और कुशलता से दर्शाया, वह उनकी वर्षों की साधना का परिणाम था। श्रोतागण पूरी तरह से उनके संगीत में खो गए थे, हर कोई एक गहरे आत्मिक अनुभव से गुजर रहा था।

प्रस्तुति का समापन जब हुआ, तो कुछ पल के लिए सन्नाटा पसर गया, फिर तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा सभागार गूंज उठा। यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा थी जो बालू मस्ती ने अपने संगीत के माध्यम से सबको कराई। उनकी दरबारी कान्हड़ा की प्रस्तुति सचमुच अविस्मरणीय थी, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि शास्त्रीय संगीत आज भी हमारी आत्मा को पोषण देने की शक्ति रखता है।

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