पुलिस की सख्त सुरक्षा घेराबंदी: ध्वस्तीकरण से पहले जनसुरक्षा सुनिश्चित
गली में तनाव का माहौल था। सुबह से ही पुलिस की गाड़ियां और सायरन की आवाजें इलाके की शांति भंग कर रही थीं। दरअसल, प्रशासन ने कुछ पुराने और जर्जर हो चुके मकानों को ध्वस्त करने का फैसला किया था। यह फैसला सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम था, क्योंकि ये मकान कभी भी गिर सकते थे और आसपास के लोगों के लिए खतरा पैदा कर सकते थे।
इसी खतरे को भांपते हुए और किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए पुलिस ने मोर्चा संभाल लिया। पूरी गली को दोनों छोर से भारी बैरिकेड लगाकर सील कर दिया गया। मोटे-मोटे रस्सों और लोहे की जाली से रास्ते बंद कर दिए गए थे। हर बैरिकेड पर पुलिसकर्मी मुस्तैद खड़े थे, उनकी आंखों में सख्ती और चेहरे पर सतर्कता साफ झलक रही थी। उनका एकमात्र मकसद यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी व्यक्ति, गलती से भी, ध्वस्त किए जा रहे मकानों के आसपास न भटक पाए।
लोगों की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। न कोई अंदर आ सकता था और न ही कोई बाहर जा सकता था, जब तक कि ध्वस्तीकरण का काम पूरा न हो जाए और इलाके को सुरक्षित घोषित न कर दिया जाए। कुछ स्थानीय निवासी जो अपने घरों तक पहुंचना चाहते थे, उन्हें भी विनम्रता से लेकिन दृढ़ता से रोक दिया गया। पुलिसकर्मियों ने उन्हें समझाया कि यह उनकी अपनी सुरक्षा के लिए है। मलबा, धूल, और पत्थरों के उड़ने का खतरा किसी के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता था।
यह कदम इसलिए उठाया गया था ताकि मकानों के गिरने से उड़ने वाले मलबे, धूल या पत्थर के टुकड़ों से कोई भी राहगीर, स्थानीय निवासी या यहां तक कि ध्वस्तीकरण कार्य में लगे मजदूर भी घायल न हो पाएं। पुलिस की यह मुस्तैदी और एहतियाती उपाय उस दिन की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी, ताकि एक बड़ी दुर्घटना को टाला जा सके और पूरी प्रक्रिया को सुरक्षित ढंग से अंजाम दिया जा सके। सुरक्षा ही सर्वोपरि थी।
