सुबह की नमी से दोपहर की तपिश: जब पारा हुआ 35 के पार
सुबह की शुरुआत हमेशा की तरह धीमी और खुशनुमा थी, जब पूरब से आती नम हवाओं ने मन को सुकून दिया। रात की बची-खुची ठंडक अभी भी हवा में घुली थी, और पेड़ों के पत्तों पर झूलती ओस की बूंदें एक नई ताजगी का एहसास करा रही थीं। भोर के इस सुनहरे पल में, पक्षियों का चहचहाना और दूर कहीं से आती चाय की महक, दिन की एक सुखद शुरुआत का वादा कर रही थी। लोग सुबह की सैर पर निकले थे, या अपने बगीचों में पौधों को पानी दे रहे थे, इस अनमोल ठंडक का हर पल लुत्फ़ उठाते हुए।
परंतु, यह शांति क्षणभंगुर थी। जैसे-जैसे सूरज आसमान में अपनी जगह बनाने लगा, उसकी किरणें धीरे-धीरे तीखी होती गईं। सुबह की सुखद नम हवाएं कब गर्म और शुष्क हवाओं में बदल गईं, पता ही नहीं चला। घड़ी की सुइयों के साथ-साथ, सूरज का ताप भी बढ़ता चला गया, और देखते ही देखते दिन की धूप इतनी असरदार हो गई कि सड़कों पर चलना दूभर लगने लगा। दोपहर होते-होते, पारा 35 डिग्री सेल्सियस के आंकड़े को कब का पार कर चुका था और मानो हर गुजरते पल के साथ एक नया रिकॉर्ड बना रहा था।
सड़कें सुनसान होने लगीं, और दोपहर की चिलचिलाती धूप में इक्का-दुक्का लोग ही नज़र आते थे, जो अपने चेहरों को कपड़े से ढके हुए या छाते की शरण में होते थे। वाहनों से निकलने वाली गर्म हवा और डामर की सड़कों से उठती तपिश मिलकर एक असहनीय वातावरण बना रही थी। घरों के अंदर भी पंखे और कूलर संघर्ष करते दिख रहे थे, और लोगों को बार-बार ठंडे पानी और शरबत की तलाश हो रही थी। बच्चों ने बाहर खेलने की जिद छोड़ दी थी, और बड़े भी अपने-अपने घरों या वातानुकूलित दफ्तरों में दुबके हुए थे। यह दिन उस गर्मी की याद दिला रहा था, जो हर साल आती है, और प्रकृति की ताकत का अहसास कराती है, जिसके सामने हमें झुकना ही पड़ता है, सिर्फ शाम की हल्की हवा और बारिश की उम्मीद में।
