सुनंदा की धुन और सान्याल के नाद से बाबा विश्वनाथ की ध्रुपद आराधना
काशी, विश्वनाथ की नगरी, जहाँ हर कण में शिव का वास है। इस पावन भूमि पर जब ध्रुपद की गूँज उठती है, तो लगता है जैसे स्वयं महादेव प्रसन्न हो उठे हों। कल्पना कीजिए उस दिव्य क्षण की, जब सुरसाम्राज्ञी सुनंदा की कंठ से निकली धुनें, मंदिर प्रांगण में एक अलौकिक वातावरण रचती हैं। उनकी आवाज़ में वो गंभीरता, वो पवित्रता है, जो ध्रुपद की आत्मा है – शुद्ध और अनन्त।
एक ओर जहाँ सुनंदा अपने स्वरों से बाबा विश्वनाथ का अभिषेक कर रही होती हैं, वहीं दूसरी ओर सान्याल के वाद्यों से निकला नाद, इस आराधना को और भी गहराता है। सान्याल के वाद्य यंत्रों की ध्वनि, चाहे वह पखावज हो या रुद्रवीणा, ध्रुपद की गरिमा को चार चाँद लगा देती है। प्रत्येक थाप, प्रत्येक तार की झंकार, सीधे हृदय को स्पर्श करती है और श्रोता को एक दिव्य लोक में ले जाती है।
यह केवल एक संगीत प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक अनुभव है। ध्रुपद की मंद्र सप्तक से शुरू होकर तार सप्तक तक की यात्रा, जीवन के उतार-चढ़ाव और अंततः मोक्ष की ओर बढ़ने का प्रतीक है। सुनंदा की गायकी और सान्याल के वादन का यह अद्भुत संगम, बाबा विश्वनाथ के चरणों में अर्पित एक अनुपम पुष्पहार है। यह पल काशी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को जीवंत करता है, जहाँ संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि उपासना का एक पवित्र माध्यम है।
जब ये दोनों महान कलाकार एक साथ होते हैं, तो ऐसा लगता है मानो शिव स्वयं डमरू बजा रहे हों और पार्वती वीणा पर संगत दे रही हों। इस अद्वितीय ध्रुपद आराधना से न केवल श्रोताओं को आनंद मिलता है, बल्कि पूरी काशी नगरी शिवमय हो जाती है। यह एक ऐसा अनुभव है, जो आत्मा को शुद्ध करता है और मन को शांति प्रदान करता है। बाबा विश्वनाथ की इस ध्रुपद उपासना में, हर सुर, हर ताल, और हर नाद, एक प्रार्थना बन जाता है।
