शिक्षा में लैंगिक असमानता: इंजीनियरिंग बनाम कला और दंत चिकित्सा
भारत में शिक्षा के क्षेत्र में लिंगानुपात एक जटिल तस्वीर पेश करता है। जहाँ एक ओर इंजीनियरिंग जैसे तकनीकी क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी लड़कों के मुकाबले काफी कम दिखती है, वहीं कुछ अन्य विषयों में वे आगे हैं। हालिया आंकड़ों पर गौर करें तो, इंजीनियरिंग शिक्षा में छात्राओं की संख्या छात्रों की तुलना में चौंकाने वाली हद तक चार गुना कम है। यह अंतर भारतीय तकनीकी संस्थानों, खासकर प्रतिष्ठित आईआईटी में और भी स्पष्ट हो जाता है।
उदाहरण के तौर पर, वर्ष 2025 में देश भर के सभी आईआईटी में कुल 18,188 सीटें उपलब्ध थीं, जिनमें से केवल 3664 छात्राओं ने ही अपना नामांकन सुनिश्चित किया। यह आंकड़ा दर्शाता है कि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अभी भी लड़कियों को प्रोत्साहित करने और उन्हें बेहतर अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है ताकि यह लिंग आधारित खाई को पाटा जा सके। तकनीकी शिक्षा में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाना न केवल लैंगिक समानता के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह देश के नवाचार और आर्थिक विकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
हालांकि, यह तस्वीर हर जगह एक जैसी नहीं है। जब हम कला और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों की बात करते हैं, तो स्थिति बिल्कुल विपरीत हो जाती है। मंच कला (Performing Arts) और डेंटल कोर्स (Dental Courses) जैसे विषयों में लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले डेढ़ गुना तक अधिक है। यह दर्शाता है कि लड़कियां उन क्षेत्रों में अधिक रुचि दिखा रही हैं जहाँ पारंपरिक रूप से भावनात्मक बुद्धिमत्ता और मानवीय संबंध अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
यह रुझान शिक्षा प्रणाली और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच के जटिल संबंधों को उजागर करता है। हमें यह समझने की जरूरत है कि क्यों कुछ क्षेत्रों में लड़कियां कम हैं और दूसरों में अधिक। क्या यह रुचियों का मामला है, या सामाजिक दबाव और रूढ़िवादिता का परिणाम? इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए हमें न केवल जागरूकता फैलानी होगी, बल्कि उन्हें उचित मार्गदर्शन, प्रोत्साहन और सुरक्षित वातावरण भी प्रदान करना होगा ताकि वे अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर सकें और देश के तकनीकी विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।
