पूर्वांचल में रबी और बागबानी फसलों पर मौसम का मिला-जुला असर: गेहूं पर संकट, सरसों में बंपर पैदावार

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पूर्वांचल का मौसम इस बार रबी और बागबानी फसलों के लिए किसी पहेली से कम नहीं रहा है। कभी हल्की ठंड, तो कभी अचानक बढ़ती गर्मी, किसानों को समझ नहीं आ रहा कि प्रकृति उनके लिए क्या लेकर आई है। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो इस मिला-जुले मौसम का असर खेतों में साफ दिखाई दे रहा है।

सबसे पहले बात करते हैं गेहूं की, जो पूर्वांचल की एक मुख्य रबी फसल है। जिन किसानों ने समय रहते गेहूं की बुवाई कर दी थी, उनके चेहरे पर संतोष की लकीरें देखी जा सकती हैं। फसलें अच्छी दिख रही हैं और उम्मीद है कि पैदावार भी बेहतर होगी। लेकिन, जिन किसानों ने देर से बुवाई की, उनके लिए चिंता बढ़ गई है। फरवरी के महीने में ही तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है, जिसका सीधा असर देर से बोए गए गेहूं पर पड़ रहा है। अधिक तापमान के कारण गेहूं के दाने सिकुड़ सकते हैं, जिससे उनका वजन कम हो जाता है और कुल पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह स्थिति किसानों के लिए आर्थिक नुकसान का सबब बन सकती है।

इसके विपरीत, सरसों की फसल के लिए यह मौसम काफी हद तक अनुकूल साबित हुआ है। समय पर बोई गई सरसों की फसलें लहलहा रही हैं और बेहतर उत्पादन की ओर अग्रसर हैं। सरसों के पौधों में अच्छी फली लगने और दानों के भराव से किसान खुश हैं। तिलहनी फसलों के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है।

बागबानी फसलों की बात करें तो उन पर भी मौसम का दोहरा असर दिख रहा है। कुछ फल और सब्जियों की फसलें जहां अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं, वहीं कुछ ऐसी भी हैं जिन्हें तापमान के उतार-चढ़ाव से जूझना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, कुछ सब्जियां जहां अच्छी उपज दे रही हैं, वहीं अचानक हुई गर्मी कुछ अन्य नाजुक फसलों के लिए चुनौती बन गई है, जिससे कीटों और रोगों का प्रकोप बढ़ने की आशंका भी है।

कुल मिलाकर, पूर्वांचल के किसानों के लिए यह वर्ष एक मिश्रित अनुभव लेकर आया है। जहां कुछ फसलों ने उम्मीद जगाई है, वहीं कुछ अन्य फसलों पर मौसम की मार पड़ने की आशंका है। ऐसे में किसानों को कृषि वैज्ञानिकों की सलाह का पालन करते हुए अपनी फसलों की विशेष देखभाल करने की जरूरत है ताकि वे संभावित नुकसान को कम कर सकें और अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकें।

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