खजूर इतवार से क्रूस तक: एक हृदय विदारक यात्रा
खजूर इतवार का दिन, येरुशलम की गलियां एक अद्भुत उत्साह से गूंज रही थीं। सूरज की सुनहरी किरणें प्राचीन पत्थरों पर पड़ रही थीं, और हवा में भक्ति और खुशी का मधुर संगीत घुला हुआ था। लोग, बच्चे-बूढ़े, सभी अपने घरों से निकलकर सड़कों पर उमड़ पड़े थे। उनके हाथों में खजूर की हरी-भरी डालियां थीं, जिन्हें वे जोश से लहरा रहे थे। हर जुबान पर एक ही जयकार थी: “होसन्ना! दाऊद के पुत्र को होसन्ना! धन्य है वह जो प्रभु के नाम पर आता है!”
इस अपार जनसमूह के बीच, एक साधारण गधे पर सवार होकर यीशु मसीह आ रहे थे। उनके चेहरे पर शांति और एक गहरा धैर्य था, मानों उन्हें आने वाले कठोर भविष्य का आभास हो। भीड़ ने अपने वस्त्र तक बिछा दिए थे, उनके स्वागत में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही थी। यह दृश्य किसी राजा के भव्य प्रवेश से कम नहीं था, पर यह राजा तलवार लेकर नहीं, बल्कि प्रेम और शांति का संदेश लेकर आया था।
किंतु यह खुशी, यह विजयोल्लास अल्पकालिक सिद्ध हुआ। कुछ ही दिनों में, वही भीड़ जो “होसन्ना” गा रही थी, “इसे सूली पर चढ़ाओ!” चिल्लाने लगी। विश्वासघात का अँधेरा छा गया। यीशु को पकड़ा गया, उन पर झूठे आरोप लगाए गए, और एक अन्यायपूर्ण सुनवाई हुई। उनके शिष्यों ने उन्हें छोड़ दिया, और वे अकेले ही अपने भाग्य का सामना करने लगे।
यातनाओं का सिलसिला शुरू हुआ। उन्हें कोड़े मारे गए, कांटों का ताज पहनाया गया, और उनके ही क्रूस को उठाकर गोलगोथा की पहाड़ी तक ले जाने पर मजबूर किया गया। हर कदम पर उनका खून बह रहा था, उनकी पीड़ा असहनीय थी। अंततः, उन्हें सूली पर कीलों से ठोक दिया गया। जिस शरीर से उन्होंने अनेकों को चंगा किया था, वह अब क्रूस पर लटक रहा था। उनके अंतिम शब्द थे, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।” यह बलिदान, यह परम प्रेम का प्रदर्शन था, मानवता के उद्धार के लिए, हमारे पापों की क्षमा के लिए। खजूर इतवार की खुशियों से लेकर क्रूस की पीड़ा तक, यह यात्रा प्रेम, त्याग और आशा का अमर संदेश छोड़ गई।
