होली पर घर वापसी: अपनों के लिए हर मुश्किल सहर्ष स्वीकार

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होली का त्योहार नजदीक आते ही, हर किसी के मन में अपने घर लौटने की ललक उमड़ पड़ती है। दूर-दराज शहरों में नौकरी या पढ़ाई करने वाले लोग, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों से अपने गांव-कस्बों की ओर रुख करने लगते हैं। यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि अपनेपन और त्योहारों की खुशियों में सराबोर होने का एक अहसास है।

इस साल भी, जैसे ही होली की तारीखें करीब आईं, रेलवे स्टेशनों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। किसी ने हफ्तों पहले से टिकट बुक करा रखे थे, तो कोई आखिरी वक्त तक उम्मीद लगाए बैठा था। दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल से लेकर मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस तक, हर स्टेशन पर पैर रखने की जगह नहीं थी। लोग लंबी कतारों में खड़े थे, उनकी आँखों में घर पहुँचने की उम्मीद और चेहरे पर थोड़ी थकावट साफ दिख रही थी।

यात्रियों की भारी भीड़ को देखते हुए भारतीय रेलवे ने कई विशेष ट्रेनें चलाईं। इन ट्रेनों का मुख्य उद्देश्य था कि कोई भी अपने परिवार के साथ होली मनाने से वंचित न रहे। लेकिन, demand इतनी ज्यादा थी कि ये स्पेशल ट्रेनें भी कम पड़ गईं। एक ट्रेन भरती, तो दूसरी ट्रेन के लिए उतनी ही भीड़ कतार में खड़ी हो जाती। जनरल डिब्बों से लेकर स्लीपर क्लास तक, हर जगह तिल धरने की जगह नहीं थी। लोग खिड़कियों से चढ़ते, एक-दूसरे से सटे हुए खड़े या बैठे यात्रा करते दिखे। सामान रखने की जगह तो दूर की बात, खुद के लिए थोड़ी सी जगह बनाना भी किसी जंग जीतने से कम नहीं था।

यह सब सिर्फ इसलिए, क्योंकि होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों का त्योहार है। परिवार के साथ हंसी-खुशी के पल बिताना, गुजिया और पकवानों का स्वाद लेना, और पुरानी यादें ताजा करना ही इस यात्रा का असली मकसद है। चाहे कितनी भी मुश्किलें हों, कितनी भी भीड़ हो, घर की दहलीज पर कदम रखते ही सारी थकान और परेशानियां दूर हो जाती हैं। यह यात्रा, कठिनाइयों से भरी होने के बावजूद, हर साल खुशी और उत्साह के साथ दोहराई जाती है, क्योंकि घर पर इंतजार कर रहे अपनों का प्यार, इन सभी मुश्किलों से कहीं ज्यादा बढ़कर है। हर यात्री की यही कोशिश होती है कि किसी भी तरह से अपने घर पहुँचकर, अपनों के साथ इस पावन पर्व को मना सके।

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