काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली: विभिन्न आयाम’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ

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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, ज्ञान और संस्कृति की यह प्राचीन नगरी, एक बार फिर एक महत्वपूर्ण बौद्धिक संगम का साक्षी बनी है। गुरुवार को विश्वविद्यालय के प्रांगण में “भारतीय ज्ञान प्रणाली : विभिन्न आयाम” विषय पर एक गरिमामयी तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य शुभारंभ हुआ। यह आयोजन केवल एक अकादमिक सभा नहीं, बल्कि भारत की उस समृद्ध विरासत के पुनरावलोकन और पुनरुत्थान का एक सशक्त प्रयास है, जिसने सदियों से मानवता को आलोकित किया है।

इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भारतीय ज्ञान प्रणाली के विविध पहलुओं – चाहे वह दर्शन, विज्ञान, कला, साहित्य, आयुर्वेद, योग, अर्थशास्त्र, या सामाजिक संरचना से संबंधित हों – पर गहन चिंतन और विमर्श करना है। सदियों से संचित यह ज्ञान केवल अतीत की धरोहर नहीं, अपितु वर्तमान की चुनौतियों का समाधान और भविष्य के पथ-प्रदर्शक के रूप में भी अत्यंत प्रासंगिक है। इस सम्मेलन में देश-विदेश के शीर्ष विद्वानों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं का जमावड़ा हुआ है, जो अपने शोध पत्रों और व्याख्यानों के माध्यम से भारतीय ज्ञान की गूढ़ताओं और आधुनिक संदर्भों में उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालेंगे।

उद्घाटन सत्र में उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों ने भारतीय ज्ञान प्रणाली के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार हमारी प्राचीन विद्याएँ, जैसे कि गणित, ज्योतिष, धातु विज्ञान, स्थापत्य कला और पर्यावरण चेतना, आज भी हमें बहुत कुछ सिखा सकती हैं। यह सम्मेलन एक ऐसा मंच प्रदान कर रहा है जहाँ पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परखा जा सकेगा और उसके नए आयामों को खोजा जा सकेगा। आयोजकों का मानना है कि इन तीन दिनों में होने वाला मंथन न केवल नए शोध मार्गों को प्रशस्त करेगा, बल्कि युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने और अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने की प्रेरणा भी देगा।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, जो स्वयं भारतीय संस्कृति और ज्ञान का एक जीवंत प्रतीक है, ऐसे आयोजनों के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। यह विश्वविद्यालय लगातार ऐसे मंच प्रदान करता रहा है, जहाँ प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संगम हो सके। यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारतीय ज्ञान प्रणाली को वैश्विक पटल पर पुनः स्थापित करने और उसके बहुमूल्य योगदान को स्वीकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आगामी तीन दिनों में होने वाली चर्चाएँ निश्चित रूप से ज्ञान के नए क्षितिज खोलेगी और भारतीय ज्ञान परंपरा को एक नई दिशा प्रदान करेंगी।

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