काशी और होली: मस्ती, रंग और अल्हड़पन का अद्भुत संगम

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होली और काशी – ये दो नाम जब एक साथ लिए जाते हैं, तो मन में एक ऐसे उत्सव का चित्र उभर आता है, जहाँ अल्हड़पन, मस्ती और अध्यात्म का अनूठा संगम होता है। यह कहना वाकई मुश्किल है कि कौन ज्यादा अल्हड़ मस्ती से भरपूर है, होली का त्योहार या सदियों पुरानी काशी नगरी। लेकिन जब ये दोनों मिल जाते हैं, तो वह धरती का सबसे मनमौजी दिन बन जाता है, जिसकी कल्पना मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है।

काशी, जिसे बनारस के नाम से भी जाना जाता है, अपनी गलियों, घाटों और अपनी चिर-परिचित मौज-मस्ती के लिए विख्यात है। यहाँ का हर कोना एक कहानी कहता है, और यहाँ के लोग जीवन को एक उत्सव की तरह जीते हैं। ऐसे में जब रंगों का त्योहार होली आता है, तो काशी अपने असली रंग में रंग जाती है। फागुन का महीना शुरू होते ही यहाँ की हवा में अबीर-गुलाल की खुशबू घुलने लगती है, और ढोल-नगाड़ों की थाप सुनाई देने लगती है।

होली के दिन काशी की सुबह कुछ अलग ही होती है। गंगा के घाट हों या शहर की संकरी गलियां, हर तरफ रंग बिरंगी टोलियाँ ‘होली है!’ का शोर मचाते हुए निकल पड़ती हैं। गुलाल और अबीर की बौछार से न सिर्फ लोग बल्कि खुद काशी नगरी भी रंगीन हो जाती है। ठंडाई और भांग का ऐसा खुमार चढ़ता है कि हर कोई अपनी सुध-बुध खोकर नाचने-गाने लगता है। यहाँ न कोई छोटा होता है, न कोई बड़ा; न कोई अपना होता है, न कोई पराया। सब एक ही रंग में रंगे, एक ही धुन में डूबे नजर आते हैं।

काशी की होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, यह जीवन को पूरी तरह से जीने का उत्सव है। यहाँ की होली में शिव की मस्ती और गंगा का पावन स्पर्श होता है। घाटों पर, मंदिरों में, और हर चौराहे पर उल्लास की लहरें उठती हैं। फाग के गीत गाए जाते हैं, पुरानी रंजिशें भुला दी जाती हैं, और हर चेहरा मुस्कान से खिल उठता है। यह अल्हड़ मस्ती, यह बेफिक्री, यह अपनत्व ही काशी और होली को मिलकर एक ऐसी अद्भुत ऊर्जा प्रदान करता है, जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलती। यह सिर्फ त्योहार नहीं, यह एक अनुभव है, एक एहसास है, जो हर काशीवासी के दिल में बस जाता है और हर आने वाले को अपना बना लेता है।

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